न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाकर लागू करना कोई सहज कार्य नहीं है . आंदोलन करने वाले किसान संपूर्ण भारत के किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं . कृषि बिल का समर्थन कुछ किसानों द्वारा किया जा रहा है . किसान संगठन द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलन को लंबे समय तक खींचा जाना सरकार और किसानों के बीच विश्वसनीयता और विचार विमर्श का रास्ता अस्पष्ट करते हैं. यदि कृषि बिलों को सरकार हटाती है और एमएसपी का कानून बनता भी है तो उसे उस रूप में लागू करना कठिन है . एमएसपी वाले मूल्य से लाभ सिर्फ बड़े जोत वाले किसान ही उठा पाएंगे क्योंकि ज्यादा विरोध प.उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसान संगठनों द्वारा किया गया है . इन क्षेत्रों में बड़े काश्तकार रहते हैं और इनकी मोटी कमाई का जरिया एफसीआई द्वारा एमएसपी पर खरीद मूल्य है. किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले आंदोलनकारियों के प्रति सरकार भी सावधान रही है किंतु आंदोलन के आड़ में राजनितिक विरोधियों द्वारा भी उल्लू सीधा करने का प्रयास किया जा रहा है . सरकार के द्वारा कृषि सुधार कानून को बनाकर परंपरागत नियमों से छुटकारा दिय...
पेगासस मुद्दे को एक बार पुनः हवा देना विदेशी मीडिया के माध्यम से कुछ इंटेलेक्चुअल्स द्वारा यह स्पष्ट करता है कि संसद के बजट सत्र के दौरान बजट पारित होने में व्यवधान उत्पन्न करना है . कांग्रेस और उसके अन्य सहयोगी दल मौजूदा सरकार को घेरे में लेने के लिए अभी से ही योजनाएं बनाने में लगे हैं .एक विदेशी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स समय-समय पर सरकार विरोधी सगुफे छोड़ते रहता है. क्या हमारी मीडिया इतनी लाचार और बेबस है कि हम अपनी मीडिया का सहारा न लेकर उन विदेशी रिप्यूटेड अखबार के पन्नों को पलटने की काबिलियत को अपनी विद्वता का परिचायक मानते हैं. यदि आप यह कहते हैं कि आप की मीडिया राजनीतिक पार्टियों विशेषकर सत्ता की पक्षधर है या उनके हाथों की कठपुतली है तो कहीं न कहीं आप अपनी बातों को मीडिया के माध्यम से जनता के सामने रखने में अपनी कमजोरी को महसूस करते हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने आखिर 2017 के समझौते को 2022 में ही क्यों उजागर किया जिससे कांग्रेस के आलाकमान और अन्य दलों के विद्वद जन मुद्दा बनाकर लोकतंत्र के खतरे के रूप में पेश कर रहे हैं . यदि पेगासस समझौता इजराइल और भारत के बीच 2017 में किया ग...