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स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ और वर्तमान सरकार

आजादी को हासिल किए हमें 75 वर्ष हो गए. इन वर्षों में हमने काफी कुछ उतार-चढ़ाव देखे हैं. विभिन्न विचारधाराएं आई और चली गई. ठीक ही कहते हैं समय से पहले औरअवसर से ज्यादा कुछ भी आप हासिल नहीं कर सकते. हमारे रहन-सहन से लेकर कामकाज के तरीके में परिवर्तन आया है .देश ने तरक्की की है इस बात को नकारा नहीं जा सकता है. आने वाले दशक में हम दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले देशों में पहले पायदान पर होंगे यह भी सत्य हैं जो हमारे लिए चुनौतीपूर्ण है.  समय और संसाधन दोनों हमारे पास सीमित हैं जिनका भरपूर उपयोग करना हमारे लिए सबसे बड़ी समस्या है. जनसंख्या के आशावादीता का सिद्धांत बढ़ती जनसंख्या पर लागू होते हैं लेकिन कुछ हद तक .उसके पश्चात न ही संसाधन बचते हैं और ना ही समय. आप करेंगे तो क्या? भुखमरी बेरोजगारी गरीबी अपराध हत्या और आत्महत्या के सिवा आपके पास कुछ भी नहीं रहता. अवसर के रूप में आप आईएसआईएस और तालिबान से सबक ले सकते हैं जो इसी का परिणाम है.  सत्ता में जब सशक्त सरकार होती है तो कधार हाईजैकिंग, आतंकी हमला, कारगिल युद्ध जैसी घटनाएं नहीं घटतीं. इनके प्रतिक्रिया स्वरूप तत्काल निर्णय लिए जाते ...

संसद की मर्यादा हाशिए पर

मानसून सत्र के आखिरी दिन संसद के दोनों सदनों के सांसदों द्वारा जिस प्रकार का बर्ताव संसद सत्र के दौरान किया गया वह बहुत निंदनीय है और ऐतिहासिक दृष्टि से लोकतंत्र की मर्यादा को शर्मसार करने वाली है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की विधायिका का जब यह हाल है तो लोकतंत्र राम भरोसे ही समझिए. राज्यसभा जिसे बड़े बुजुर्गों का सदन कहा जाता है गणमान्य लोगों का सदन है और स्थाई सदन भी है जिसे कभी भंग नहीं किया जा सकता है ऐसा हम जानते हैं लेकिन इस सदन को भंग करने का ऐसा भी एक तरीका आने वाले दिनों में हो सकता है इसे हमने देखा और जाना भी. सरकार संसद सत्र के दौरान विभिन्न बिलों पर चर्चा करने के मूड में दिख रही थी लेकिन विपक्ष सरकार का पेगासस मुद्दे पर  घेराव करना चाह रही थी. बिलों पर चर्चा करने के बजाय पक्ष - विपक्ष द्वारा शोर कर संसद का कार्य बाधित करने का प्रयास किया गया . यह काम 10 और 11 अगस्त को दोनों सदनों में पक्ष- विपक्ष के सांसदों द्वारा किया गया. यह संसद कार्यकाल में डिजिटल मीडिया में हमेशा के लिए दर्ज कर लिया गया है. दोनों ही पक्षों द्वारा अब आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं. गलती किसकी है ...

अन्य पिछड़े वर्ग की राह नई जनसंख्या नीति 2021

लोकसभा में 10 अगस्त को पेगासस मुद्दे पर बहस के बीच ही कुछ विधेयक लाए गए जिसमें ओबीसी विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. आने वाले विधानसभा चुनाव 2022 में इसका फायदा राजनीतिक दलों को मिलने की संभावना बनती है. जिस राजनीतिक दल द्वारा जातियों को ओबीसी में शामिल किया जाएगा उसका फायदा उन्हें मिलेगा. हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में 27 ओबीसी मंत्रियों को शामिल किया गया है और ओबीसी कानून भी लाया गया जिसकी राजनीतिक मंशा स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है और हाँ 50 फ़ीसदी आरक्षण का  हर हालत में ध्यान में रखना है. अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित परीक्षाओं में 15% अनुसूचित जातियों से 7.5% जनजातियों से और 27% ओबीसी वर्ग  से आरक्षण दिया जाता है.  ऐसे में  राज्य सरकारों द्वारा ओबीसी श्रेणी में जातियों को शामिल करने पर इसका दायरा बढ़ाने की आवश्यकता होगी.  करीब 671 जातियां ऐसी पूरे देश में  हैं जो ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत आने लायक है . इसलिए एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि किसे शामिल किया जाए और किसे इस श्रेणी से हटाया जाए.   राज्य सरकारों को इन विकट समस्याओं ...