लोकसभा में 10 अगस्त को पेगासस मुद्दे पर बहस के बीच ही कुछ विधेयक लाए गए जिसमें ओबीसी विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. आने वाले विधानसभा चुनाव 2022 में इसका फायदा राजनीतिक दलों को मिलने की संभावना बनती है. जिस राजनीतिक दल द्वारा जातियों को ओबीसी में शामिल किया जाएगा उसका फायदा उन्हें मिलेगा.
हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में 27 ओबीसी मंत्रियों को शामिल किया गया है और ओबीसी कानून भी लाया गया जिसकी राजनीतिक मंशा स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है और हाँ 50 फ़ीसदी आरक्षण का हर हालत में ध्यान में रखना है.
अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित परीक्षाओं में 15% अनुसूचित जातियों से 7.5% जनजातियों से और 27% ओबीसी वर्ग से आरक्षण दिया जाता है. ऐसे में राज्य सरकारों द्वारा ओबीसी श्रेणी में जातियों को शामिल करने पर इसका दायरा बढ़ाने की आवश्यकता होगी.
करीब 671 जातियां ऐसी पूरे देश में हैं जो ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत आने लायक है . इसलिए एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि किसे शामिल किया जाए और किसे इस श्रेणी से हटाया जाए.
राज्य सरकारों को इन विकट समस्याओं से निपटना है. आने वाले 2022 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा विभिन्न जातियों को लोकलुभावन चुनावी आश्वासन दिए जाएंगे. राज्य सरकार अपने स्तर पर अल्पसंख्यक जातियों और बहुसंख्यक जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने के प्रयास करेंगे लेकिन संवैधानिक सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है. इसीलिए ओबीसी विधेयक के समर्थन के साथ-साथ आरक्षण की सीमा जो 50% निर्धारित की गई है उसे भी लगे हाथ बढ़ाने की मांग पार्टियों द्वारा की जाने लगी है जाति आधारित जनगणना की मांग की तो हो ही रही है.
2022 के विधानसभा चुनाव गोवा, मणिपुर ,उत्तराखंड पंजाब, उत्तर प्रदेश में होने वाले हैं. इसलिए इस विधेयक का पारित होना सभी राजनीतिक दलों के लिए काफी महत्वपूर्ण है. उत्तर प्रदेश में ओबीसी समूह की संख्या ज्यादा है इसलिए यह विधेयक आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए काफी महत्वपूर्ण है. आने वाले चुनाव से पहले ओबीसी जाति समीकरण के उलट फेर होने की संभावना है.
कोविड-19 के कारण जनगणना में हुई देरी सत्ताधारी पार्टियों के लिए विभिन्न राज्यों में वोटबैंक को और मजबूत करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. कारण स्पष्ट हो चुके हैं फिर भी इसे एक साथ जोड़कर चलते हैं पेगासस मुद्दे पर चल रहा विवाद, ओबीसी, आरक्षण बिल और जाति आधारित जनगणना यह तीनों आपस में तालुकात रखते हैं.
जहां पेगासस इ मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियां सदमे में हैं वहीं पत्रकारों को भी डर है कि उनको दिया गया जुमला "गोदी मीडिया' साबित न हो जाए .इसलिए जोर और विरोध द्वारा इसपर एक जांच समिति का गठन कर विधानसभा चुनाव 2022 तक इसे टालने का प्रयास जारी रहेगा और इसमें सफलता भी मिलेगी क्योंकि इसमें सरकार और विपक्ष के लोगों की सच्चाई सामने आने का डर है.
जाति आधारित जनगणना की मांग हालांकि पार्टियों द्वारा की जा रही है लेकिन उन्हें डर है कि जाति आधारित जनगणना के कारण उनको मिलने वाले वोट का विकेंद्रीकरण हो सकता है . इसलिए जनगणना के इस तरीके की मांग से वह ज़्यादा इत्तेफाक नहीं रखते हैं.
देश में 1872 से लेकर 1931 तक जातीय जनगणना किए गए. 1941 में जाति आधारित जनगणना का काम तो शुरू हुआ लेकिन विश्व युद्ध के कारण इसे छोड़ दिया गया. 1948 से यह काम जनगणना अधिनियम के अंतर्गत होने लगा.1951 से लेकर अबतक( 2011) यह सिलसिला जारी है.
मंडल कमीशन को जब आरक्षण से संबंधित आंकड़े की जरूरत पड़ी थी तो उसने जाति आधारित जनगणना के बारे में भी कहा था. बिना किसी तात्कालिक आंकड़े के मंडल कमीशन द्वारा 1931 के जातिगत जनगणना को ही आधार मानकर आरक्षण की रिपोर्ट देना पड़ा था.
1951 से लेकर अबतक की जनगणना में एससी, एसटी के आंकड़े ही इकट्ठा किए जाते रहे अन्य पिछड़े वर्ग के कल्याण हेतु सरकार एक अनुमान के आधार पर ही आर्थिक सुविधाएं देती रही है. जाति आधारित जनगणना से सही आंकड़े की पहचान होगी. अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल लोगों की वर्तमान स्थिति की जानकारी के अलावा ऐसे समूह जो पीछे छूट गए हैं उन्हें भी शामिल कर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ दिया जा सकेगा.
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि ओबीसी बिल कानून का रूप ले चुका है तो जाति आधारित जनगणना के बिना सही मायने में यह सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति होगी क्योंकि ओबीसी संख्या के बिना न राजनीतिक प्रतिनिधित्व संभव है और नाही आर्थिक लाभार्थियों का उचित वर्गीकरण.
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