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127वां संविधान संशोधन और जाति आधारित जनगणना

पृष्ठभूमि

2021 की जनगणना की राह जातीय समीकरण की ओर जाते हुए प्रतीत हो रही है और इसी को देखते हुए जहां उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण विधेयक 2021 प्रारूप तैयार कर इसे पारित करने का प्रयास किया जाएगा वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार द्वारा 10 अगस्त को 127 वां संविधान संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद 342 और 366 (22)cमें संशोधन कर राज्यों को ओबीसी सूची बनाने का अधिकार दिया गया.
अब राज्य अपने स्तर पर हो रही मांगों के अनुसार ओबीसी सूची तैयार कर सकेंगे. इस विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों द्वारा पारित कर राज्यों को यह अधिकार दिए गए जो लंबे समय से मांग किए जा रहे थे . 
ओबीसी समूह में शामिल होने को लेकर महाराष्ट्र में मराठा समुदाय, हरियाणा में जाट ,गुजरात में पटेल और कर्नाटक में लिंगायत समुदाय द्वारा मांग की जा रही थी अब उन्हें इस कैटेगरी का लाभ मिल सकेगा.

राजनीतिक पहल

जाति आधारित जनगणना की पहल मोदी सरकार द्वारा पहले की गई किंतु पार्टी के आंतरिक दबाव के कारण इसे बीच में ही छोड़ना पड़ा था.
महाराष्ट्र में भी पूर्व के बीजेपी सरकार द्वारा मराठा समूह को लेकर एक विधेयक पारित किया गया था किंतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा उस पर रोक लगा दी गई थी.
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जब जनसंख्या नियंत्रण नीति का प्रारूप लाया गया तो बिहार के जदयू शासक नीतीश कुमार द्वारा जनसंख्या नीति को खारिज किया गया और 24 जुलाई 2021 को जाति आधारित जनगणना की मांग की गई जिसे सरकार द्वारा मना कर दिया गया था.
असल में जाति आधारित राजनीति को मजबूत आधार देने और आरक्षण का लाभ राजनीतिक मंशा की पूर्ति हेतु वोट बैंक को साधने के लिए ही जनगणना की मांग राजनेताओं के द्वारा की गई है.
कोविड-19 के कारण भी नेताओं की जनता से दूरियां और राजनीतिक उलटफेर की आशंका ने भी उन्हें इस प्रकार की जनगणना के लिए बाध्य कर दिया है .
बीजेपी और आरएसएस द्वारा ओबीसी समूह के अलावा मुसलमानों के प्रति अपनी छवि को लेकर सुधार हेतु क्षेत्रीय स्तर पर कार्यकर्ताओं और प्रतिभाशाली भावी पीढ़ियों के नेताओं की तलाश की जा रही है वहीं बिहार के सीएम नीतीश कुमार द्वारा अपनी पार्टी को आत्म निर्भरता की राह पर लाते हुए अन्य अगड़ी जातियों के समर्थन की आवश्यकता भी महसूस हो रही है.
अगले बिहार विधानसभा चुनाव 2024 में होंगे और वे यह गलती नहीं करेंगे जो बीजेपी के साथ रहने पर उन्हें 28 सीटों को गांव कर मिला है.
एनडीए गठबंधन में रहते हुए भी नीतीश कुमार केंद्र सरकार के हर निर्णय में समर्थन का इत्तेफाक नहीं रखते अपनी छवि को दोबारा नया रूप देते हुए उन्होंने पार्टी कमान ललन सिंह के हाथों में सौंप दी है जो सवर्ण जाति भूमिहार से तालुकात रखते हैं.
नीतीश कुमार के सामने एक बड़ी चुनौती है इस समुदाय के अतिरिक्त अन्य सवर्णों के साथ तालमेल स्थापित करना.
इधर उत्तर प्रदेश में विगत दो दशकों से आरक्षण का लाभ विशेष तबके के द्वारा अच्छे तरीके से उठाया गया है जिसमें यादव और जाटव सम्मिलित हैं इसी नाराजगी का लाभ बीजेपी उठाने का प्रयास कर रही है. 
जनगणना में एससी और एसटी वर्ग के आंकड़े जुटाए जाते हैं पिछड़े वर्गों के नहीं जबकि देश में पिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या काफी बड़ी है

आगे की राह 

जाति आधारित जनगणना यदि होती है तो बहुसंख्यक  और अल्पसंख्यक समूह को उनकी मांगों को देखते हुए राज्य सरकारों द्वारा ओबीसी आरक्षण सूची तैयार की जाएगी जिसमें अगड़ी जातियां भी शामिल हो सकती हैं.  अल्पसंख्यक समूहों को  विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा ताकि उनके हितों की अनदेखी ना हो सकें.

चुनौतियां 

राज्य सरकारों को आरक्षण सूची  से संबंधित अधिकार मिलने के पश्चात इनके द्वारा इस बात का ध्यान रखना होगा कि विशेष तबके के लोगों द्वारा ही ओबीसी सूची का लाभ नहीं उठाया जाए .
अगड़ी पंक्ति में शामिल लोग यदि समूह का लाभ लेंगे तो सामाजिक समायोजन में विरोध के स्वर गूंजेगे .
ओबीसी में पर्याप्त संख्या का संतुलन और समायोजन करने वाली समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना होगा.

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