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तालिबानी अफगानिस्तान और भारत पर उसके प्रभाव

तालिबान का काबुल पर कब्जा होने के बाद उसके द्वारा सार्वजनिक रूप से यह कहा गया कि वहां की आवाम को उन से डरने की आवश्यकता नहीं है. फिर भी तालिबान के विगत वर्षों के अनुभव से उस पर विश्वास करना संभव नहीं है .अफगानिस्तान के लोगों का पलायन बाहर के मुल्कों में तेजी से हो रहा है. तालिबानी नेताओं द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया कि वह बदल गए हैं. उसके कथनी और करनी में अब तक अंतर ही रहा है. काबुल को नियंत्रण में लेते ही स्त्रियों पर उसने अपने कानून सख्त कर दिए. अफसर गनी अपने कुछ लोगों के साथ विदेश पलायन कर गए क्योंकि अमेरिका ने मदद करने से हाथ खड़े कर दिए.

अमेरिकी रणनीति

9/11 के आतंकी हमले को अमेरिका द्वारा मानवता बनाम आतंकवाद के युद्ध का नाम दिया गया वहीं तात्कालिक राष्ट्रपति जो बिडेन का यह कहना है कि बस; अमेरिकी धरती पर किसी प्रकार का आतंकवादी हमला न हो दोहरे मापदंड को दर्शाता है. एक तरफ आतंकियों के खिलाफ व्यक्तिगत लड़ाई को विश्वरूप देना तो दूसरी तरफ अपनी अस्मिता की दुहाई देना समझने वाली बात है.

अमेरिका को आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में काफी नुकसान उठाना पड़ा जिसे ट्रंप सरकार द्वारा रोक कर अपने कार्यकाल की उपलब्धियों में शामिल करने का प्रयास किया गया जबकि महामारी द्वारा कितने अमेरिकी लोग उनके कार्यकाल के दौरान मरे.

अमेरिका और तालिबानी नेताओं द्वारा दोहा राजनीतिक वार्ता के दौरान शांति समझौते के अंतर्गत अमेरिका को वहां से हटना पड़ा. यह एक राजनीतिक वार्ता थी अफगानिस्तान से हटने की या चीन के पाकिस्तान पर बढ़ते प्रभाव को देखते हुए चीन और रूस को भविष्य में इनके द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले आतंकवादी हमलों का एक सौदा.

अमेरिकी सहयोग से ही आतंक की नींव रखी गई और उसकी फंडिंग भी की गई व्यक्तिगत रूप से कहना अनुचित नहीं है. अमेरिका द्वारा आएसआई को ट्रेंड किया गया और आईएसआई द्वारा जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को प्रशिक्षण दिया गया.

इन आतंकी संगठनों की फंडिंग चीन, रूस, अमेरिका जैसे देशों द्वारा किसी न किसी रूप में की गई जिसमें पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि पाकिस्तान का गठन ही इस्लाम और सांप्रदायिकता का आधार है  जिसे ब्रिटेन ने 1947 में अंजाम दिया था.

इस्लाम के मूल में पाकिस्तान की हकीकत

आज दुनिया में सबसे ज्यादा मदरसे पाकिस्तान में है जहां इस्लाम की शिक्षा दी जाती है जबकि हकीकत यह है कि इन मदरसों में धार्मिक कट्टरता सिखाई जाती है. स्लीपर सेल्स भी इन्हीं मदरसों द्वारा तैयार किए जाते हैं. दुनिया के जितने भी इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के नेता हुए इनके शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र यह मदरसे ही रहे जिनकी फंडिंग विदेशी मुद्रा द्वारा शिक्षा के नाम पर धर्म के नाम पर और इस्लाम के अस्तित्व के नाम पर की जाती रही है .महामारी के दौरान फंडिंग कम होने की वजह से आतंकवादी गतिविधियों में कमी आई है

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों के आवागमन में कमी और सीमा सुरक्षा बढ़ा दिए जाने के कारण भी इस तरह की गतिविधिया यदा-कदा दिखी हैं क्योंकि सभी अपने जीवन और अस्तित्व के साथ संघर्ष कर रहे थे .अमेरिका द्वारा अफगान सरकार को किसी भी प्रकार की सैन्य सहायता न देना ,चीन और रूस द्वारा अपने नागरिकों और अधिकारियों को स्वदेश बुलाना किसी न किसी रूप में अमेरिकी सरकार के दूरदर्शी सोच की तरफ इशारा करते हैं.

भारत पर पड़ने वाले प्रभाव

मध्य एशिया में वर्चस्व को लेकर संघर्ष अपने आप में एक कठिन सवाल है जिसका प्रभाव चीन, रूस और भारत जैसे देशों से जुड़ा हुआ है. तालिबान का वर्चस्व यदि इस्लामिक देशों पर बढ़ता है तो इसका उपयोग चीन, पाकिस्तान के माध्यम से अपने हितों के लिए भारत के विरुद्ध करेगा. इसलिए भारत को अपने कूटनीतिक प्रयासों द्वारा इससे निपटने की आवश्यकता है क्योंकि मुसीबत आपके दरवाजे पर है.

काबुल को तालिबान द्वारा नियंत्रण में लेते ही भारत के कुछ मुस्लिम नेताओं द्वारा खुशी जताई गई  और भारत के मुसलमानों के तरफ से उन्हें सलाम भेजा गया जो भारतीय मुसलमानों को असहज करने वाला और बेहूदा हरकत है. इस प्रकार की सोच और वक्तव्य इन नेताओं की मानसिकता को स्पष्ट करते हैं. वर्तमान सरकार को मुसलमान विरुद्ध बताने वाले संकीर्ण   मानसिकता वाले नेता  इस प्रकार की बातें करेंगे . इन्हें इस प्रकार के वक्तव्य के लिए बाहर से पैसे मिलते हैं या फिर धार्मिक सौहार्द्रता  को चुनाव से पहले यह खत्म करने का प्रयास करने में लगे हैं

आगामी कुछ महीनों में पाकिस्तान का आईएसआई अफगानिस्तान में सक्रिय होगा और आतंकवादी गतिविधियां फिर एक बार तेज होगी क्योंकि पाकिस्तान के आय का मुख्य स्रोत इस्लाम के नाम पर आने वाला फंड और मदरसों में दिए जाने वाले जिहादी शिक्षा है. 

चीन द्वारा शुरू से ही भारत में होने वाले आतंकवादी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर तथा हथियार के रूप में सहायता दी गई है. 

तालिबानियों द्वारा काबुल को अपने नियंत्रण में लेते ही चीन ने तालिबानी नेताओं से संपर्क स्थापित करना शुरू किया और तालिबान की हुकूमत को अफगानिस्तान में स्वीकृति दे रहा है और उन्हें आर्थिक सहायता की भी पेशकश की गई है.

 भारत के लिए समस्या बना पाकिस्तान चीन की सहायता से तालिबानियों से संपर्क और मजबूत कर आतंकवादी गतिविधियों को भारत के विरुद्ध तेज कर सकता है.

 2022 में भारत के 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं .उत्तर प्रदेश इनमें सबसे प्रमुख राज्य है चुनाव की दृष्टि से क्योंकि हिंदुत्ववादी छवि के नेता इसी राज्य से संबंध रखते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र बनारस है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जो मुख्य रूप से हिंदुत्ववादी छवि के लिए जाने जाते हैं गोरखपुर जैसे क्षेत्र से आते हैं.इन स्थानों पर विशेष सुरक्षा की आवश्यकता होगी .

 कश्मीर में अभी भी सांप्रदायिक नेता स्वतंत्र हैं. पाकिस्तान से उनके तालुकात अच्छे रहे हैं अन्यथा आतंकवादी गतिविधियों का निशाना योगी और मोदी जैसे नेता ही क्यों होते हैं, अन्य कश्मीरी नेता क्यों नहीं. ये फिर से कश्मीर की स्थिरता को भंग कर सकते हैं. इसलिए इस प्रकार की हरकतों पर सरकार को सावधान रहने की आवश्यकता है.

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