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अगले एक दशक के लिए हमारी बढ़ती जनसंख्या कितनी चुनौतीपूर्ण है

जनसंख्या वृद्धि की बात सामने आते ही माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत की चर्चा होने लगती है जिसमें उन्होंने जनसंख्या वृद्धि के कारण मानव पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाया है साथ ही स्त्री पुरुष के नैसर्गिक काम आवेग को आधार मानते हुए बताया है कि जनसंख्या वृद्धि की गुणोत्तर श्रेणी जीविकोपार्जन की दर को समानांतर श्रेणी में बढ़ाती है. निष्कर्ष यह है कि उत्पादन की दर जितनी भी बढ़ाई जाए जनसंख्या के वृद्धि दर से कम ही होती है. जनसंख्या वृद्धि दर का स्तर तीव्र ,स्थिर और कम तीन चरणों से संबंधित होता है.
 
प्रथम चरण में जनसंख्या की वृद्धि संसाधनों की तुलना में ज्यादा होती है जिसके चलते समाज में गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी और अपराध ज्यादा होते हैं.
 
द्वितीय चरण में जनसंख्या वृद्धि स्थिर होने से संसाधनों का अनुपातिक उपयोग अनुकूल होता है यानी संसाधन आवश्यकता से ज्यादा उपयोग नहीं होते और भविष्य के लिए सुरक्षित होते हैं .
 
तृतीय चरण में जनसंख्या की घटती दर से वृद्धि संसाधनों के उपयोग की क्षमता को कम कर देते हैं परिणामस्वरूप संसाधन के विपुल भंडार हो जाते हैं जिसका दोहन करने के लिए तीव्र जनन दर  की आवश्यकता होती है इसी क्रम में संसाधनों का उपभोग जनसंख्या द्वारा किया जाता है.
जनसंख्या वृद्धि के प्रथम चरण में आने वाले देश अविकसित होते हैं और विकासशील की अवस्था प्राप्त करने के लिए संसाधनों के दोहन की क्षमता में इन्हें वृद्धि करनी पड़ती है. तेजी से बढ़ती जनसंख्या के जीविकोपार्जन के लिए यह आवश्यक होता है इसी चरण में रोजगार में वृद्धि होती है, निवेश बढ़ते हैं, रोजगार के स्तर में  सुधार होता है. 
जनसंख्या वृद्धि के तीसरे चरण विकास की चरम सीमा को प्राप्त होने के पश्चात विकास की दर गिरने लगती है और एक स्तर पर स्थिर हो जाती है जहां यह विकसित देशों की श्रेणी प्राप्त कर लेते हैं.
 भारत जनसंख्या के वृद्धि के दूसरे दौर से गुजरते हुए संसाधनों के अधिकतम उपयोग के तरफ बढ़ रहा है किंतु इसके कुशलतम उपयोग के लिए जनसंख्या को दक्ष संपत्तियों का रूप देना अनिवार्य है अन्यथा संसाधनों के दोहन में अतिव्ययिता होगी और वह तेजी से खत्म होते चले जाएंगे.
भारत की बढ़ती जनसंख्या की वर्तमान स्थिति यह है कि करीब दो तिहाई भाग जनसंख्या कामकाजी रूप में तैयार है और 50 फ़ीसदी से भी कम भाग काम में लगा है.विकसित देशों में यह श्रेणी 50 फ़ीसदी से ज्यादा है जिसमें मुख्य रुप से यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन, अमेरिका आते हैं. वर्तमान में कामकाजी लोगों में महिलाओं की भूमिका 36 फ़ीसदी और पुरुषों की भागीदारी 64 फ़ीसदी है.
जनसंख्या नियंत्रण कानून द्वारा 2021 के बाद वाले दशक में कई राज्यों में उम्रदराज़ लोगों की संख्या बढ़ेगी आने वाले 2 दशकों में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले व्यक्तियों की संख्या दुगनी हो जाएगी और प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि दर अवरुद्ध हो जाएगी.
बिहार ,उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान ऐसे राज्य हैं जो अतिरिक्त 11 राज्यों में घटते कामकाजी लोगों की संख्या की भरपाई करेंगे.
अगले एक दशक की भारत की जनसंख्या 140 करोड के करीब होगी जो विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश की सूची है. जनगणना 2021- 31 का दशक जनसंख्या नियंत्रण की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है जनसंख्या नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाने के साथ-साथ स्त्री साक्षरता के अलावा कामकाजी स्त्रियों की संख्या में वृद्धि करना होगा. 
विभिन्न सर्वेक्षणों द्वारा यह स्पष्ट भी हो चुका है कि कामकाजी महिलाओं द्वारा दो से अधिक बच्चों का पोषण नहीं किया जा सकता है और वह ज्यादा संतान जन्म से भी बचती है.
एक सर्वे यह भी कहती है कि कामकाजी महिलाओं में  पुरुषत्व हार्मोन के स्राव से उनके मातृत्व क्षमता में कमी आती है या उन पर ऑफिस के कामकाज के अलावा घर की जिम्मेदारी होने के कारण वह ज्यादा बच्चे पैदा करने से बचती हैं.

बढ़ती जनसंख्या का बोझ, वृद्धों की संख्या में बढ़ोतरी ,रोजगार, स्वास्थ्य ,शिक्षा यह सभी समस्याएं सरकार के समक्ष महत्वपूर्ण चुनौतियों के रूप मे है. इनसे निपटने के लिए सरकार द्वारा महिलाओं में शिक्षा ,जागरूकता और  रोजगार का विकास करने के साथ-साथ कुछ ठोस कदम भी उठाने होंगे जैसे लड़के और लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र को बढ़ाना, सरकारी नौकरियों में महिलाओं की संख्या बढ़ाकर 50 फ़ीसदी करना ,सरकारी नौकरियों के योग्य उम्मीदवारों के संतान उत्पन्न न होना. साथ ही जिन्हें इन योग्यताओं के आधार पर नौकरी दी जाती है उन्हें  विशेष सुविधाएं भी प्रदान करना जिससे समाज को एक प्रेरणा मिले जो जनसंख्या नियंत्रण में कारगर हो.

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