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पाकिस्तान की इमरान सरकार खतरे में

अफगानिस्तान पर तालिबान शासन आते ही सभी मुस्लिम आतंकी गुट सक्रिय हो गए हैं भले ही पाकिस्तान इस बात से पूर्णतः इत्तेफाक रखता हो कि तालिबान शासन पाकिस्तान के हुकूमत का ही हिस्सा है. आने वाले दिनों में यह शासन इमरान सरकार के मार्ग को अवरुद्ध करने वाला है क्योंकि तालिबान को पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार पसंद नहीं वह शरिया के अनुसार शासन करना चाहता है.
आतंकी संगठनों के पुनः सक्रिय होने का मुख्य कारण अमेरिका का वापस वतन लौटना है जिसने करीब 20 वर्षों तक आतंकी संगठनों को पनपने से रोके रखा है. 
9/11 की घटना को आधार मानते हुए अमेरिका द्वारा मानवता बनाम आतंकवाद के नाम पर मध्य एशिया में अपने सैन्य अभियान की शुरुआत की गई जिसे बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप की सरकारों का पूर्ण समर्थन था. जो बिडेन  के आते ही अमेरिकी सेना अपने वतन वापस लौट गई. अमेरिका द्वारा कूटनीतिक प्रयास से आतंकवाद रूपी हथियार को तैयार कर उसे खत्म करने का प्रयास किया गया लेकिन इसकी जड़ें काफी मजबूत हो चुकी है जिसका श्रेय पाकिस्तान को जाता है. पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों के तालीम से लेकर हथियारों की ट्रेनिंग ,पड़ोसी मुल्कों में घुसपैठ कराने के साथ-साथ उनकी फंडिंग भी की जाती है. यही व्यवस्था पाकिस्तान सरकार के लिए गले की हड्डी बन जाती है. पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन का खेल शुरु हो चुका है जिसकी शुरुआत पाकिस्तान के विदेश मंत्री जनरल बाजवा द्वारा तालिबान यात्रा से की जा चुकी है .आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हक्कानी नेटवर्क ऐसे आतंकी समूह है जिन्हें पाकिस्तान में स्थापित लोकतंत्र पसंद नहीं है. अभी हाल ही में इमरान खान को अपने आवास से अलग हटने की चेतावनी वहां की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा दी गई है. ड्रोन हमले का अंदेशा और आवास के ऊपर से आतंकियों द्वारा ड्रोन को सफर कराना सरकार के लिए शुभ लक्षण नहीं है. हक्कानी नेटवर्क के सक्रिय होने से इमरान खान के राजनीतिक अस्तित्व पर खतरा है और पुन : एक बार सत्ता परिवर्तन की गुंजाइश है जिसकी कमान जनरल बाजवा के हाथों में होगी. पाकिस्तान के चरमपंथी और आतंकी गुट लोकतंत्र को हावी नहीं होने देते और बीच-बीच में तख्तापलट का खेल पाकिस्तान में चलते रहता है.

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