विगत कुछ दिनों से तालिबान भारत के साथ अपने रिश्ते में सुधार को लेकर चर्चा में है जिसे भारत सरकार के अनुकूल स्टेटमेंट जारी कर वह दुनिया के सामने रख रहा है. लेकिन तालिबान के कथनी और करनी में अंतर है .
1996 से 2001 तक तालिबान का अफगानिस्तान पर शासन के दौरान देखा जा चुका है शरिया के अनुसार उनका कानून और विशेषकर महिलाओं और बच्चों के साथ किए जाने वाले उनके अमानवीय व्यवहार को पूरी दुनिया ने देखा.
भारत के लिए 1996 की कंधार हाईजैक की पुरानी चोट और ऊपर से तालिबान का भारत के अनुकूल स्टेटमेंट कुछ हजम नहीं होने वाली बात है.
भारत सरकार द्वारा अपने दूतावास को तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए बंद करने का फैसला किया गया और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्धता जताते हुए एक विशेष ऑपरेशन के तहत भारतीय वायुसेना के विमान द्वारा भारत लाया जा रहा है.
प्रधानमंत्री द्वारा अभी हाल ही में यह कहना कि आतंक के बलबूते यदि कोई सरकार बना भी ले वह अस्थाई नहीं हो सकता है इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत तालिबानी शासन को किस नजरिए से देखता है.
अभी अफगानिस्तान में तीन विदेशी दूतावास ज्यादा सक्रिय हैं जिसमें चीन, पाकिस्तान और रूस शामिल हैं. इनके अपने कुछ राजनीतिक लाभ और स्वार्थ शामिल है. इन के द्वारा तालिबान से नजदीकियां बढ़ाई जा रही हैं लेकिन फिर भी किसी ने भी प्रत्यक्ष रूप से अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन को मान्यता नहीं दी है.
चीन द्वारा तालिबान से नजदीकियों के पीछे का सच भारत में पनपने वाले आतंकवाद को पाकिस्तान की मदद से जीवित रखना है और उसकी फंडिंग करना भी है अर्थात चीन भारत के एशिया में बढ़ते प्रभाव को रोकने का प्रयास कर रहा है जबकि उसके द्वाराउइगर मुसलमानों पर किए जाने वाले जुल्म दुनिया के किसी भी देश से छुपे नहीं है.
इस बात का भय है कि कहीं तालिबान के संपर्क में आकर ये मुसलमान आतंकवादियों का समर्थन न करने लगे और आतंकवाद चीन में हावी ना हो जाए जिसकी विषाद अमेरिका द्वारा तालिबान के साथ एक राजनीतिक समझौते के माध्यम से बिछा दी गई है. यही बात रूस पर भी लागू होती है जिसके विघटन में अमेरिका का महत्वपूर्ण हाथ रहा.
विघटन से पूर्व अफगानिस्तान में शामिल होने वाले कुछ प्रांत को यू एस एस आर द्वारा एक देश के रूप में मान्यता दी गई. फिर वही विषाद अमेरिका द्वारा तालिबान के माध्यम से तैयार किया गया जिसकी जानकारी रूस को अच्छे तरीके से है. रूस उसे किस तरीके से लेता है यह आने वाले दिनों में रूस द्वारा उठाए गए कदम से स्पष्ट हो जाएगा.
पाकिस्तान के इमरान सरकार द्वारा तालिबान से बेहतर तालुकात का लाभ पाकिस्तान के आतंकवादी गतिविधियों को और मजबूत करने वाला है और उसे आर्थिक मदद भी चीन द्वारा मिलती रहेगी. भारत के साथ सबसे बड़ी समस्या तालिबानी शासन को लेकर है.
अभी हाल ही में तालिबान के स्टेटमेंट द्वारा स्पष्ट होता है जिसमें तालिबान ने पाकिस्तान को अपना दूसरा घर बताया साथ ही अफगानिस्तान में आइएसआई की सक्रियता को लेकर इनकार करते हुए यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण तरीके से हल करना चाहिए जबकि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख द्वारा भारत को लेकर यह कहा गया कि भारत द्वारा अफगानिस्तान में की जाने वाली मदद और वहां निर्माण परियोजनाओं का मकसद पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाना है . तालिबान की हुकूमत से अफगानिस्तान और भारत का प्रभाव खत्म हो जाएगा; यह स्पष्ट करते हैं कि पाकिस्तान की मंशा क्या है.
अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन से चरमपंथी संगठनों को मजबूत होने का मौका मिल गया है और इसे उनका समर्थन भी प्राप्त है. भविष्य में भारत को आतंकवादी चरमपंथी संगठनों से काफी नुकसान होने की संभावना है जो भारत के विकास में बाधाएं उत्पन्न कर सकते हैं . इसलिए भारत द्वारा वैश्विक स्तर पर राजनीतिक पहल इस प्रकार से की जा रही है कि तालिबान को कूटनीतिक दृष्टि से घेरा जा सके और पून: अफगानिस्तान में लोकतंत्र स्थापित हो सके जिसे अमेरिका द्वारा ही स्थापित कर खत्म कर दिया गया.
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