योग अर्थात व्यक्ति विशेष का समाज से जुड़ाव है. समाज से जुड़कर समाज के अनुरूप रहते हुए समाज के लिए कार्य करने वाला व्यक्ति योगी है. एक योगी का कार्य मानव मात्र के लिए कल्याण है किसी मजहब के लिए नहीं .आपको थोड़ी द्विधा भी होगी और अचरज भी.
एक आदर्श समाज की स्थापना योग है.इसमें रमे रहना योग है और कर्ता योगी है. सामाजिक निर्माण की कल्पना से ही राष्ट्र का स्वरूप निर्धारित होता है और योगी का तपोबल उसमें कार्य करता है .उसकी रचना में प्रकृति भी सहायता करती है .चाहे प्राकृतिक आपदा हो या मानवीय आपदा सदैव योगी की परीक्षा होती है और व्यक्ति कर्ता होते हुए भी अकर्ता का भाव लेकर नित्य निरंतर समाज निर्माण में लगा रहता है. संभावित घटनाओं का साक्षी होते हुए भी एक दृष्टा का भाव योगी रखता है, अनासक्त होकर कर्म करता है. योगी की श्रेणी में इससे ऊपर राजयोगी आता है जो इससे अधिक अनासक्त होता है. राजयोगी समस्त भौतिक सुखों से जुड़ा रह कर भी अनासक्त होकर कर्म करता है. वह राजप्रासाद का उपयोग जन कल्याण हेतु करता है. नियमों से बंधे होने के कारण सैद्धांतिक जीवन जीता है और समाज कल्याण का कार्य करता है.
कोई भी व्यक्ति समाज का भले ही नेतृत्वकर्ता होजाए सामाजिक कार्यकर्ता बन जाए पर योगी नहीं बन सकता
क्योंकि यह कठिन है .उससे भी ज्यादा कठिन है कर्मयोगी बनना.
नेतृत्वकर्ता योगी के रूप में कर्म योगी और राजयोगी बनना भारत के लिए नए युग की शुरुआत है. सत्ता सुख और राज्य सुख योगी से जुड़ा नहीं होता . वह इससे लिप्त होता हुआ भी निर्लिप्त होता है . समाज का अग्रदूत होता है. इसके विपरीत राजभोगी राजप्रासाद से युक्त सुख सुविधाओं में रहकर उसमें ही आसक्त रहता है. सदा काम से प्रेरित मदांध होता है. मिथ्या दंभ और अहंकार उसकी पहचान होती है. वह सदा अपने हित को देखता है. परिवारवाद वंशवाद उसकी पहचान होती है. शासन सत्ता जो उसे जनता के प्रसादपर्यंत प्राप्त होती है वह उसे वंशानुगत करने का प्रयास करता है .उसके द्वारा अपने अनुयायियों का भला किया जाता है उसका जीवन मिथ्यावर्ग कर्म पर आधारित होता है.
वर्तमान समय ऐसा ही है भौतिकवाद की ओर चलते हुए अपनी मूल संस्कृति से दूर होता जा रहा हमारा समाज पाश्चात्य रहन-सहन और खान-पान के तरफ तेजी से जा रहा है. हम अन्य सभ्यताओं का अनुकरण कर उसके अनुसार बनने का प्रयास करते हैं. कारण स्पष्ट है भारत अनेक आक्रांताओं का अनुभव रखता है जो भी यहां बाहर से आया इसकी सभ्यता और संस्कृति से प्रभावित हुआ और हम भी उनके साथ तालमेल स्थापित आसानी से करते रहे.
दुर्भाग्य यह है कि हमें अपनी पहचान को ढूंढना है जबकि पाश्चात्य देशों ने हमें पहचान लिया है वह जानते हैं कि भारत की धरती बेशकीमती सभ्यता का खजाना है जिसे अपने साथ ले जाने का वो प्रयास करते हैं.
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