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पेगासस और भारतीय राजनीति

 अभी हाल ही में पेगासस से संबंधित जो मामले भारतीय राजनीति और मीडिया में चर्चा के विषय बने हुए हैं कि सरकार द्वारा उनका  प्रयोग  पत्रकारों नेताओं के खिलाफ जासूसी में किया जा रहा है. 

दरअसल यह मामला पहली बार 2016 को प्रकाश में आया जो संयुक्त अरब अमीरात से जुड़ा है.

 बाद के क्रमशः वर्षों में विभिन्न देशों में भी यह चर्चा का विषय बना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते दबाव के चलते इजरायल सरकार द्वारा इस प्रोग्राम के डेवलपर कंपनी की जांच के आदेश देने पड़े.

पेगासस है क्या?

 पेगासस एक स्पाइवेयर प्रोग्राम है जिसे इजरायली साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ द्वारा बनाया गया है .

यह किस प्रकार काम करता है?

टेक्स्ट मैसेजेस के माध्यम से यह स्मार्टफोन तक अपनी पहुंच बनाता है उसके बाद स्मार्टफोन के संवादों, मॉनिटर कॉल्स ,यहां तक कि फोन के कैमरे और माइक्रोफोन को भी एक्टिव कर सकता है।

एनएसओ पर लगने वाले आरोप

 कंपनी द्वारा कहा गया है कि वह यह प्रोग्राम केवल मान्यता प्राप्त सरकारी एजेंसियों को ही बेजती है जो इसका इस्तेमाल आतंकवाद और अपराधियों के पकड़ने के लिए करती है.

जासूसी से संबंधित विवाद को लेकर विभिन्न देशों के साथ इस कंपनी के विवाद चल रहे हैं जिसका खामियाजा इजरायली सरकार को भुगतना पड़ रहा है और इसकी सुरक्षा और जासूसी से संबंधित उपकरणों को विदेशी व्यापार खतरे में पड़ सकता है. 

2019 का फेसबुक और एनएसओ का भी एक विवाद है जिसमें फेसबुक का कहना है कि इसने व्हाट्सएप के माध्यम से मैसेज द्वारा लोगों के फोन में इस प्रोग्राम को पहुंचाया और बात सामने आई की फेसबुक जैसी ही एक वेब डेवलपर करके डोमेन नेम के माध्यम से यह लोगों के फोन तक पहुंचा.

बाद में फेसबुक के कथनानुसार फेसबुक ने उस डोमेन नेम को खरीद लिया ताकि लोगों की निजता बनी रहे.

मिलाजुला कर फिर वही बात निजता के कानून का उल्लंघन जो भारत में एक अपराध की श्रेणी में आता है .हालांकि भारत में जासूसी अपराध की श्रेणी में नहीं है इसके लिए भारत सरकार की कई एजेंसियां अधिकृत है.

सरकार और राजनीति

भारत में ही कई राज्य सरकारें इस स्पाइवेयर प्रोग्राम का इस्तेमाल कर रही हैं जिसे स्पष्ट रूप से कंपनी द्वारा खुलासा नहीं किया गया.

 राज्य सरकारें इसका इस्तेमाल अपने विरोधी राजनेताओं पत्रकारों और मानवाधिकारों के अलावा धर्म गुरुओं पर कर  रही है ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है.

 यह अंदेशा व्यक्त करने वाले या तो अपनी निजता की पोल खुलने से डरते हैं या फिर उनकी राजनीतिक मंशा की पोल खोलने का डर है कि पैसे की हेराफेरी और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से उनके तालुकात सरकार के पास चले जाएंगे और समय आने पर सत्ताधारी पक्ष उन्हीं सूचनाओं को सार्वजनिक कर अपनी राजनीतिक रोटी सकेगा.

एक और बात यहां ध्यान देने वाली है कि इस तरह की सूचनाओं की हैकिंग कर उन्हें बेचा भी जाता है जो सरकारों से संबंधित होती हैं.

 सरकार ही जासूसी नहीं करा रही अन्य देशों की संस्थाएं भी इस तरह के स्पाइवेयर प्रोग्राम का इस्तेमाल भारत सरकार के विरुद्ध कर रही हैं.

आखिर हम इतने कमजोर कैसे हैं इस तरह के प्रोग्राम के लिए दूसरे देशों पर निर्भर करना पड़ रहा है या हमारे पास इतना समय नहीं है जो भी हो भारत के सैन्य ड्रोन बाजार से लेकर के सुरक्षा उपकरणों तक इजरायल इजरायल के पूर्ण या आंशिक रूप से नियंत्रण में है .

 वैसे भी भारत में इस तरह की स्पाई प्रोग्राम की कमी के चलते एनएसओ जैसी कंपनियां आगे आती है जिसका  मुनाफा उन्हें बहुत ज्यादा होता है.

यह स्पाइवेयर प्रोग्राम जिसका इस्तेमाल सरकार द्वारा जासूसी के लिए किया जाता है बिल्कुल एक नशे की तरह काम करती हैं जिसकी वह आदि हो चुके होते हैं आने वाले दिनों में उनके विकसित रूप को खरीदने के लिए सरकारें पुनः कंपनी निर्भर रहती हैं.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है जिसकी सुनवाई संभवत 15 अगस्त के पहले होगी. 2022 के विधानसभा चुनाव के पहले इस मामले को विपक्षियों और पत्रकारों के दबाव में आकर सरकार को कोई अनुकूल कानून बनाना पड़ सकता है.

 संभवतः अगले वर्ष के राज्य विधानसभा चुनाव से पहले इस पर कुछ ठोस पहल की जाए क्योंकि हर राजनेता और पत्रकार भ्रष्टाचार में लिप्त होकर भ्रष्टाचार मुक्त समाज की बात करेेगा.

 उसे डर है कि सरकार द्वारा उसे निशाना बनाया जा सकता है और उसकी दाल रोटी जा सकती है.



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