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संसद की मर्यादा हाशिए पर

मानसून सत्र के आखिरी दिन संसद के दोनों सदनों के सांसदों द्वारा जिस प्रकार का बर्ताव संसद सत्र के दौरान किया गया वह बहुत निंदनीय है और ऐतिहासिक दृष्टि से लोकतंत्र की मर्यादा को शर्मसार करने वाली है.

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की विधायिका का जब यह हाल है तो लोकतंत्र राम भरोसे ही समझिए. राज्यसभा जिसे बड़े बुजुर्गों का सदन कहा जाता है गणमान्य लोगों का सदन है और स्थाई सदन भी है जिसे कभी भंग नहीं किया जा सकता है ऐसा हम जानते हैं लेकिन इस सदन को भंग करने का ऐसा भी एक तरीका आने वाले दिनों में हो सकता है इसे हमने देखा और जाना भी.

सरकार संसद सत्र के दौरान विभिन्न बिलों पर चर्चा करने के मूड में दिख रही थी लेकिन विपक्ष सरकार का पेगासस मुद्दे पर  घेराव करना चाह रही थी. बिलों पर चर्चा करने के बजाय पक्ष - विपक्ष द्वारा शोर कर संसद का कार्य बाधित करने का प्रयास किया गया . यह काम 10 और 11 अगस्त को दोनों सदनों में पक्ष- विपक्ष के सांसदों द्वारा किया गया.

यह संसद कार्यकाल में डिजिटल मीडिया में हमेशा के लिए दर्ज कर लिया गया है. दोनों ही पक्षों द्वारा अब आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं. गलती किसकी है यह जनता जनार्दन जानती है. जब रक्षक और विधि बनाने वाले अपने को जनता के हितैषी कहने वाले ही इस तरह से अमर्यादित बनते हैं तो लोकतंत्र रहा कहां सिर्फ कागज के पन्नों पर.  सदन में टेबल पर खड़े हो जाना फिर सदन के महिला मार्शल के साथ अभद्रता करना इनके नैतिक मूल्यों के पैमाने की परख को प्रदर्शित करता है

आखिर पेगासस मुद्दे पर ही विपक्ष सरकार को क्यों करना चाहती है ? कहीं न कहीं ऐसा है जिससे वह डरती है और कार्य बाधित कर सरकार पर हावी होने का प्रयास कर रही है अन्यथा शांति पूर्वक सदन चलते रहता. सरकार की मंशा और विपक्ष का प्रतिरोध दोनों जगजाहिर है विपक्ष कमजोर है यह अच्छे तरीके से जानती है और सरकार भी कमजोरी का फायदा उठाते हुए ऐसी स्थिति में ही एक के बाद एक विधेयक को पारित करती चली गई.

 बिगत बुधवार को धक्का -मुक्की के विरोध में विपक्ष द्वारा गुरुवार को राहुल गांधी की अगुवाई में संसद से विजय चौक तक 15 विपक्षी दलों के साथ मार्च निकाला गया. उनके हाथों में कुछ पोस्टर थे जिस पर पेगासस, कृषि बिल और महंगाई से संबंधित मु्द्दे भरे थे. 

आक्रामक रूख कहां तक उचित है इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि केंद्र के एक साथ आठ मंत्रियों द्वारा पलटवार करते हुए प्रेस के माध्यम से आठ प्रकार के आरोप लगाए गए. इस प्रकार के आक्रामक रुख द्वारा न संसद का कार्य सुचारू तरीके से चल सकता है और नाही  एक कमजोर विपक्ष द्वारा सरकार के कार्यों पर अंकुश ही लगाया जा सकता है.

हालांकि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के चेयरमैन द्वारा आपसी विचार विमर्श के बाद कुछ सांसदों के विरुद्ध कड़े फैसले लिए जाने की संभावना है और आने वाले सत्र के दौरान इस प्रकार के कार्यों के लिए कड़े निर्देश दिए जा सकते हैं.

 संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए यदि भविष्य में इस प्रकार की गलतियों को नहीं रोका गया तो लोकतंत्र की धज्जियां उड़ते देर नहीं लगेगी.

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