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विचारों की मनोदशा

 मस्तिष्क थका हुआ सा लेखनी को धीमी गति से सफेद कागज पर ले जाते हुए मेरे विचारों को लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहा है लेकिन सोचने की क्षमता अवरुद्ध सी हो गई है. नए विचार कहां से लाऊं? आंतरिक ध्वनि  मुझे विचार शून्य करती जा रही है  अवरुद्ध होने का प्रयास जारी है फिर भी  लिखता जा रहा हूं . दैनिक कार्यों में से एक कार्य अध्ययन- अध्यापन से जुड़ा है इसीलिए लेखनी को तराशने की कोशिश करता रहता हूं. विचारों के भवर में होने से अच्छा है कि दो शब्द मन के अल्फाजों को लिखते हुए नींद की आगोश में चला जाऊं. हो सकता है लिखना आधा अधूरा रह जाए और मैं सो जाऊं एक मधुर सपनों को देखता हुआ. जब नींद से प्रातः उठ जाऊं तो मुझे विस्मृत हो जाए शेष लेखन का सफर. जीवन का उद्देश्य एक उपलब्धि को पाने की ललक बहुत कम लोगों में होती है क्यों ?इसलिए कि भौतिकवादी जीवनयापन आपके विचारों को सीमित कर देता है और आप न चाहते हुए भी अपने इस जीवन शैली के बंधनों में उलझ कर रह जाते हैं. अभी अपनी यही मनोदशा है. आप यह जानते हैं कि मन कमबख्त  बहुत ही चलायमान है. इसे आपके नियंत्रण की आवश्यकता नहीं ,जहां चाहे वहां मौजूद है ,पगला है बेचारा तिलिस्म तैयार करना और इस में उलझ कर समस्याएं पैदा करना इस की पुरानी आदत है .मन के अनुसार बुद्धि हो तो व्यक्ति चंचल होता है और उसके कर्म भी चंचला होते हैं अर्थात में स्थिरता नहीं होती. इसके विपरीत बुद्धि के अनुसार मन हो तो वह कुशलता पूर्वक अपने कार्यों को संपादित करता है यह बात अलग है कि कर्म की प्रकृति किस प्रकार की है.

आंखें बंद होते ही अंधेरा छा जाता है या कहिए अंधेरे में आंखों को खुला रखना दोनो ही मस्तिष्क के द्वार तक जाते हैं जिसमें विचारों के आवागमन का चक्र चलता रहता है. इन्हीं विचारों का परिणाम लेखन भी है. बंद आंखों से आप विचारों को देख सकते हैं जबकि अंधेरे में खुली आंखों से आप विचार शून्यता का बोध कर सकते हैं. दोनों ही परिस्थितियां आपके साथ होती हैं अंतर्द्वंद चलता रहता है .आप करें भी तो क्या यही मेरी मनोदशा है. आपके विचार भी एक मुसाफिर की तरह होते हैं कब आएंगे कब जाएंगे कहना मुश्किल है. हां; मस्तिष्क के द्वार उसके विश्राम कक्षके तरह होते हैं जहां यह कुछ पल के लिए विश्राम करते हैं जहां आपकी कार्यशैली का योजनाबद्ध निर्माण होता है. इसलिए विचारों के अंतर्द्वंद में उलझने से अच्छा है मैं गहरी नींद में चला जाऊं और अपने विश्राम गृह में आनेवाले अतिथियों की सहायता द्वारा व्यक्तित्व निर्माण की योजना को मूर्त रुप दूं.

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