पेगासस मुद्दे को एक बार पुनः हवा देना विदेशी मीडिया के माध्यम से कुछ इंटेलेक्चुअल्स द्वारा यह स्पष्ट करता है कि संसद के बजट सत्र के दौरान बजट पारित होने में व्यवधान उत्पन्न करना है .
कांग्रेस और उसके अन्य सहयोगी दल मौजूदा सरकार को घेरे में लेने के लिए अभी से ही योजनाएं बनाने में लगे हैं .एक विदेशी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स समय-समय पर सरकार विरोधी सगुफे छोड़ते रहता है. क्या हमारी मीडिया इतनी लाचार और बेबस है कि हम अपनी मीडिया का सहारा न लेकर उन विदेशी रिप्यूटेड अखबार के पन्नों को पलटने की काबिलियत को अपनी विद्वता का परिचायक मानते हैं.
यदि आप यह कहते हैं कि आप की मीडिया राजनीतिक पार्टियों विशेषकर सत्ता की पक्षधर है या उनके हाथों की कठपुतली है तो कहीं न कहीं आप अपनी बातों को मीडिया के माध्यम से जनता के सामने रखने में अपनी कमजोरी को महसूस करते
हैं.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने आखिर 2017 के समझौते को 2022 में ही क्यों उजागर किया जिससे कांग्रेस के आलाकमान और अन्य दलों के विद्वद जन मुद्दा बनाकर लोकतंत्र के खतरे के रूप में पेश कर रहे हैं .
यदि पेगासस समझौता इजराइल और भारत के बीच 2017 में किया गया तो आगामी विधानसभा चुनाव और संसद बजट सत्र के समय ही इसे क्यों उछाला जा रहा है ?
कहीं न कहीं कुछ लोचा है जो राजनीतिक दलों के नेताओं की पोल की ढोल से जुड़ा है. उन्हें भी वही डर सताने लगा है कि सरकार नेताओं की जासूसी करा रही है.
यदि हथियारों की दो अरब डॉलर के डील के साथ भारत द्वारा इसे खरीदा गया और यह रक्षा सौदे के तहत था तो सामाजिक कार्यकर्ताओं ,पत्रकारों और नेताओं को इससे डरने की आवश्यकता क्यों है?
ये सभी आखिर इमानदारी से देश की सेवा ही तो कर रहे हैं.रही बात जासूसी करने की तो देश की आंतरिक सुरक्षा और बाहरी सुरक्षा के लिए यदि पेगासस स्पाइवेयर का प्रयोग किया भी जाता है तो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए .
मीडिया किसके साथ सौदेबाजी करती है? किसके न्यूज़ का तड़का लगाती है? नेताओं के साथ इसके क्या सांठगांठ है? इसकी सच्चाई उजागर होने का डर है .
नेताओं की सत्ताधारी पार्टियों के साथ क्या डील हुए? कितने लोगों को किन-किन माध्यमों से कहां-कहां नोट पहुंचाया जाएगा? उन नोटों के आगमन के स्रोत कहां से हैं? इसकी जानकारी सरेआम आ जाएगी इस का डर है.
समाजसेवियों के धन के स्रोत का माध्यम क्या है? इसके राज भी खुलने का डर है इसलिए यह वर्ग हल्ला कर रहे हैं.
राहुल गांधी सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे को हवाला देते हुए" सरकार देशद्रोही है," तक कह देते हैं जो सर्वथा अनुचित है. शब्दों की मर्यादा को तथाकथित तरीके से सरकार के विरोध में प्रदर्शित करना राहुल जी की राजनीतिक शैशवावस्था को ही दर्शाता है.
दरअसल आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्ष के रणनीतियों में चुनाव प्रचार से लेकर पार्टी प्रबंधन और राजनीतिक मुद्दे पर उचित तालमेल की कमी दिख रही है जिसका प्रभाव परस्पर सामंजस्य की कमी को दर्शाता है.
विपक्ष यदि इस प्रकार के मुद्दे पर सरकार को घेरता है तो पार्टियों के चुनाव प्रचार पर इसका असर पड़ेगा और विपक्ष पहले से ज्यादा कमजोर हो सकता है.
इसलिए जरूरत है मोदी की आलोचना के बजाय विकास और रोजगार को जनता के समक्ष रखने की जिसमें मोदी सरकार की कमी स्पष्ट रूप से झलकती है.
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