भारत की बढ़ती हुई आबादी से आने वाले दशकों में देश के समक्ष बहुत सी चुनौतियां उत्पन्न होंगी जिसके लिए तैयार रहना आवश्यक है या फिर जनसंख्या नियंत्रण द्वारा इन चुनौतियों से आसानी से निपटा जा सकता है.
बढ़ती हुई आबादी द्वारा आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं, उद्योग धंधे स्थापित होते हैं, रोजगार उत्पन्न होते हैं, वस्तुओं की उपयोगिता बढ़ती है और राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है जिससे सामाजिक स्तर में सुधार होता है.
इसके विपरीत बढ़ती हुई जनसंख्या द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है. प्रदूषण से कई प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं , प्रति व्यक्ति आय सीमित हो जाती है क्योंकि कुल राष्ट्रीय आय का बंटवारा कई भागों में हो जाता है. परिणामतः लोगों का जीवन स्तर पहले की तुलना में निम्न हो जाता है.
ऐसी स्थिति में लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को और गति देना पड़ता है जो निवेश प्रोत्साहन के रूप में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और व्यापार से जुड़ा होता है.
जनसंख्या नियंत्रण अपने आप में एक कठिन सवाल भी है और मुद्दा भी. जनसंख्या वृद्धि के लिए आप किसी समुदाय विशेष पर दोषारोपण नहीं कर सकते और ना ही जनसंख्या नियंत्रण का कानून बनाकर उसे पालन करने के लिए जोर जबरदस्ती कर सकते हैं.
इरादा भले ही नेक हो लेकिन बर्बरता उचित नहीं इसे हम 1976 -77 भारत सरकार के मंसूबे द्वारा समझ सकते हैं.
1976 और 1977 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली यही कांग्रेस सरकार- आज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के लिए तैयार किए गए ड्राफ्ट का- विरोध कर इसे सांप्रदायिकता से जुड़ रही है - ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए नसबंदी कार्यक्रम को शक्ति से लागू करने के लिए सारी शक्तियां लगा दी थी.
करीब 800000 लोगों की नसबंदी की गई थी जिसका खामियाजा 1977 के आम सभा चुनाव में इंदिरा गांधी को अपनी सीट गंवाकर चुकाना पड़ा था.
पिछले दिनों ही 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नई जनसंख्या नीति की घोषणा की गई जो काफी विवादित रही जबकि इसे अभी कानून का रूप दिया जाना बाकी है.
इस ड्राफ्ट पर लोगों की प्रतिक्रिया ली जा रही थी जैसा होगा उसके अनुसार संशोधन कर इसे कानून का रूप दिया जाएगा .
उत्तर प्रदेश को छोड़ 9 राज्यों में यह कानून किसी न किसी रूप में लागू है
2017असम- सरकारी नौकरी- दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते.
2007 बिहार -नगर पालिका चुनाव- दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते हैं.
1993 ओडिशा- शहरी स्थानीय निकाय चुनाव- दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते.
2002 उत्तराखंड- नगर पालिका चुनाव दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते .
2003 महाराष्ट्र -ग्राम पंचायत और नगर पालिका चुनाव- दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते .
इसके अलावा जन वितरण प्रणाली का फायदा भी दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले को नहीं मिल सकता.
स्टेट सिविल सर्विसेज में उनका चयन नहीं हो सकता.
1994 आंध्र प्रदेश- पंचायती राज चुनाव- दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते
तेलंगाना जिस समय यह कानून लागू किया था उस समय आंध्र प्रदेश का ही भाग था .
1994 राजस्थान -पंचायती एक्ट 1994 -दो या दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते. दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले को सरकारी नौकरी के योग्य माना नहीं जाएगा.
2005 गुजरात -पंचायत और नगरपालिका चुनाव में लोकल अथॉरिटी एक्ट 2005 के अनुसार अयोग्य माना जाएगा जिनकी दो से अधिक बच्चे होंगे.
बावजूद इसके उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाए जाने वाले इस कानून का विरोध किया जा रहा है हालांकि इस ड्राफ्ट में प्रोत्साहन और हतोत्साहित दोनों का मिलाजुला रूप है.
प्रोत्साहन
सरकारी सेवा कर्मियों को जिनके दो संतानें हो उन्हें 2 अतिरिक्त वेतन में वृद्धि
मातृत्व अवकाश और पितृत्व अवकाश दिए जाएंगे उनके रोजगार कोष में वृद्धि होगी.
हतोत्साहन
दो से अधिक संतान होने पर सरकारी नौकरी की योग्यता खत्म कर दी जाएगी.
स्थानीय चुनाव नहीं लड़ सकेंगे.
सरकारी नौकरियों में पदोन्नति से वंचित रहेंगे और उन्हें कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी.
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए जनसंख्या नियंत्रण कानून के ड्राफ्ट में ऐसा कुछ भी विरोध करने लायक नहीं है फिर भी इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है और 2022 के विधानसभा चुनाव का राजनीतिक
हथकंडा बताकर मुसलमान विरोधी बताया जा रहा है.
वर्तमान राजनीति का गढ़ उत्तर प्रदेश है जो देश की राजनीति की दिशा और दशा दोनों तय करता है तो जाहिर सी बात है विरोधियों के लिए भी तो कुछ मुद्दा चाहिए भले ही देश हित में समाज हित में या राज्य हित में क्यों न हो है ना.
बहुत ही अच्छी समीक्षा व ज्ञान वर्धक लेख
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद
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